भारत में सोयाडॉक संकट 2026: बढ़ती कीमतों से पोल्ट्री, डेयरी और फीड इंडस्ट्री पर दबाव क्यों बढ़ रहा है
भारत में खाने के तेल का आयात कोई नयी बात नहीं है
भारत की वार्षिक खाद्य तेल आवश्यकता वर्तमान में लगभग 25–26 मिलियन टन मानी जाती है, लेकिन घरेलू उत्पादन कुल मांग का केवल लगभग 40% ही पूरा कर पाता है, जो करीब 9.5–10 मिलियन टन के आसपास है। बाकी 15–16 मिलियन टन खाद्य तेल हर साल आयात करना पड़ता है। कुल आयातित खाद्य तेल में लगभग 50% पाम ऑयल, 35% सोयाबीन ऑयल और करीब 15% सूरजमुखी तेल का हिस्सा होता है। इसी भारी आयात निर्भरता के कारण भारत को हर साल लगभग ₹1.5–1.6 लाख करोड़ विदेशी मुद्रा खाद्य तेल आयात पर खर्च करनी पड़ती है।

इस पूरे सिस्टम में घरेलू सोयाबीन उत्पादन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत की कुल खाद्य तेल टोकरी में लगभग 2–2.5 मिलियन टन खाद्य तेल सोयाबीन से आता है। यह देश की कुल खाद्य तेल आवश्यकता का लगभग 10% हिस्सा है। यही कारण है कि सोयाबीन उत्पादन में किसी भी बड़ी गिरावट का सीधा असर खाद्य तेल कीमतों के साथ-साथ सोयाडॉक उपलब्धता पर भी पड़ता है।
पिछले 10 वर्षों के दौरान भारत का सोयाबीन उत्पादन अधिकांश समय 11 मिलियन टन से ऊपर बना रहा। यहां तक कि 2016 और 2019 जैसे कठिन वर्षों में भी, जब सोयाडॉक की कीमतें ₹100 प्रति किलो तक पहुंच गई थीं, तब भी उत्पादन वर्तमान स्थिति की तुलना में अधिक स्थिर था। 2021 से 2025 के बीच तो उत्पादन अधिकतर 12.5–13 मिलियन टन के बीच बना रहा, जिससे फीड इंडस्ट्री को अपेक्षाकृत आरामदायक सप्लाई मिलती रही।
लेकिन अब SOPA और USDA के मौजूदा अनुमान 2025–26 के लिए कमजोर स्थिति दिखा रहे हैं। इस वर्ष उत्पादन लगभग 10.5–11 मिलियन टन रहने का अनुमान है, जो पिछले कुछ वर्षों की तुलना में काफी कम है। पहली नजर में 2–2.5 मिलियन टन की गिरावट बहुत बड़ी नहीं लग सकती, लेकिन पोल्ट्री और डेयरी फीड इंडस्ट्री के लिए यह कमी इतनी बड़ी है कि इससे सोयाडॉक उपलब्धता और फीड इकॉनॉमिक्स दोनों पर गंभीर दबाव बन सकता है।
भारत को हर साल घरेलू फीड मांग के लिए लगभग 6–6.6 मिलियन टन सोयाडॉक की आवश्यकता होती है, जबकि लगभग 2 मिलियन टन सोयाडॉक निर्यात मांग के लिए चाहिए होता है। इस तरह कुल वार्षिक आवश्यकता लगभग 8.5–8.6 मिलियन टन के करीब पहुंच जाती है। सामान्यतः 100 किलो सोयाबीन से लगभग 75 किलो सोयाडॉक तैयार होता है। पिछले वर्षों में 12.5–13 मिलियन टन सोयाबीन उत्पादन के कारण भारत लगभग 9.3–9.7 मिलियन टन सोयाडॉक तैयार कर पा रहा था। लेकिन यदि उत्पादन 10.5 मिलियन टन के आसपास रहता है, तो कुल सोयाडॉक उत्पादन लगभग 7.8 मिलियन टन तक गिर सकता है। यानी लगभग 0.8 मिलियन टन का सप्लाई गैप बन रहा है, जो वर्तमान सोयाडॉक संकट की सबसे बड़ी वजहों में से एक है।
इसका असर अब साफ तौर पर पोल्ट्री, डेयरी और फीड मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में दिखाई देने लगा है क्योंकि सोयाडॉक अभी भी भारत में पशु आहार का सबसे महत्वपूर्ण प्रोटीन स्रोत बना हुआ है। इसकी अहमियत केवल क्रूड प्रोटीन प्रतिशत तक सीमित नहीं है। बेहतर अमीनो एसिड प्रोफाइल, अच्छी डाइजेस्टिबिलिटी, स्थिर गुणवत्ता और भरोसेमंद फॉर्म्युलेशन वैल्यू के कारण फीड इंडस्ट्री में इसकी भूमिका बहुत मजबूत है। यही वजह है कि वैकल्पिक प्रोटीन स्रोतों के बढ़ते उपयोग के बावजूद सोयाडॉक को पूरी तरह रिप्लेस करना आसान नहीं है।
कई फीड निर्माता अब DDGS, DORB, रेपसीड मील और ग्वार मील जैसे विकल्पों का उपयोग बढ़ा रहे हैं ताकि सोयाडॉक पर निर्भरता कम की जा सके। लेकिन ये सभी सामग्री पोषण की दृष्टि से सोयाडॉक का पूर्ण विकल्प नहीं बन पातीं। दूसरी तरफ, सोयाडॉक महंगा होने के बाद इन वैकल्पिक प्रोटीन स्रोतों की मांग भी तेजी से बढ़ी है, जिसके कारण पूरे प्रोटीन फीड मार्केट में कीमतें ऊपर चली गई हैं। परिणामस्वरूप फीड निर्माता अब अधिक आक्रामक राशन रीफॉर्म्युलेशन और टाइट लीस्ट-कॉस्ट फॉर्म्युलेशन की ओर बढ़ रहे हैं।
पोल्ट्री इंडस्ट्री पर इसका दबाव सबसे अधिक दिखाई दे रहा है क्योंकि ब्रॉयलर उत्पादन लागत में फीड का हिस्सा लगभग 65–70% तक होता है। फीड कीमतों में थोड़ी वृद्धि भी सीधे पोल्ट्री इकॉनॉमिक्स को प्रभावित करती है। डेयरी सेक्टर में प्रभाव अपेक्षाकृत धीमा दिखता है क्योंकि दूध उत्पादन तुरंत नहीं गिरता, लेकिन लंबे समय तक ऊंची फीड लागत वहां भी दूध कीमतों, मुनाफे और फीडिंग प्रैक्टिस पर असर डालती है।
मौजूदा सोयाडॉक संकट का एक महत्वपूर्ण पहलू भारत की नॉन-GM पहचान भी है। भारतीय सोयाडॉक को अंतरराष्ट्रीय बाजार में नॉन-GM होने के कारण प्रीमियम कीमत मिलती है। यही कारण है कि सोयाबीन प्रोसेसिंग इंडस्ट्री बड़े स्तर पर GM सोयाडॉक आयात का विरोध कर रही है।
पोल्ट्री फेडरेशन ऑफ इंडिया (PFI) और कई अन्य पोल्ट्री संगठनों ने सरकार से लगभग 15 लाख टन GM सोयाडॉक आयात की अनुमति देने की मांग की है ताकि फीड लागत कम की जा सके और बाजार को स्थिर किया जा सके। वैश्विक स्तर पर इस समय ब्राजील और अर्जेंटीना जैसे देशों में मजबूत उत्पादन के कारण सोयाडॉक कीमतें अपेक्षाकृत नरम हैं, जिससे आयातित GM सोयाडॉक भारतीय बाजार की वर्तमान ₹68–72 प्रति किलो कीमत की तुलना में काफी सस्ता पड़ सकता है।
इंडस्ट्री विशेषज्ञों का मानना है कि यदि लगभग 8–12 लाख टन सोयाडॉक आयात किया जाता है तो अल्पकाल में कीमतें फिर से ₹50–55 प्रति किलो के करीब लाई जा सकती हैं। जबकि पोल्ट्री इंडस्ट्री द्वारा मांगा गया 15 लाख टन आयात एक प्रकार का सुरक्षा बफर माना जा रहा है ताकि आगे सप्लाई संकट और न बढ़े।
हालांकि आयात की अनुमति देने में कई बड़ी चुनौतियां मौजूद हैं। भारत वर्तमान में सोयाबीन के लिए सख्त नॉन-GM नीति अपनाता है और देश में GM सोयाबीन की खेती की अनुमति नहीं है। बड़े स्तर पर GM सोयाडॉक आयात भी कड़े नियंत्रण में है। SOPA सहित कई प्रोसेसिंग संस्थाएं आयात का विरोध कर रही हैं क्योंकि उनका मानना है कि सस्ता आयातित सोयाडॉक घरेलू सोयाबीन और सोयाडॉक कीमतों को नीचे ला सकता है, जिससे किसानों और क्रशिंग इंडस्ट्री को नुकसान होगा।
इसके अलावा भारत का नॉन-GM सोयाडॉक अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रीमियम स्थिति रखता है और बड़े स्तर पर GM आयात इस पहचान को कमजोर कर सकता है। साथ ही कुछ उद्योग विशेषज्ञ आयातित GM सोयाडॉक में डाइजेस्टिबिलिटी, अमीनो एसिड स्थिरता, अफ्लाटॉक्सिन और पेस्टिसाइड अवशेषों को लेकर भी चिंता जता रहे हैं।
दूसरी तरफ सरकार पर पोल्ट्री और डेयरी इंडस्ट्री का दबाव भी लगातार बढ़ रहा है क्योंकि यदि फीड लागत लंबे समय तक ऊंची बनी रहती है तो ब्रॉयलर चिकन कीमतों में और वृद्धि हो सकती है, अंडों की कीमतों पर दबाव बना रह सकता है और डेयरी फीड लागत भी लगातार बढ़ सकती है। इसका असर अंततः प्रोटीन फूड इन्फ्लेशन और Consumer Price Index (CPI) पर भी दिखाई दे सकता है।
भारत इससे पहले 2021–22 में भी इसी तरह की स्थिति देख चुका है, जब सरकार ने लगभग 12 लाख टन GM सोयाडॉक आयात की अनुमति दी थी। उस समय आयात शुरू होने के कुछ ही सप्ताहों में घरेलू सोयाडॉक कीमतों में नरमी आई थी और पोल्ट्री फीड लागत काफी हद तक स्थिर हुई थी। हालांकि उस दौरान घरेलू सोयाबीन कीमतों पर कुछ महीनों तक दबाव भी देखने को मिला था।
मई 2026 तक भारत सरकार ने अभी तक बड़े स्तर पर GM सोयाडॉक आयात को मंजूरी नहीं दी है। सरकार फिलहाल किसानों के हित, घरेलू क्रशिंग इंडस्ट्री, पोल्ट्री सेक्टर और फूड इन्फ्लेशन के बीच संतुलन बनाने की कोशिश कर रही है। लेकिन यदि आयात की अनुमति दी जाती है तो टेंडरिंग, शिपिंग और पोर्ट क्लियरेंस प्रक्रिया के बाद शुरुआती खेप 30–45 दिनों के भीतर भारत पहुंच सकती है। वहीं 8–12 लाख टन का पूरा आयात बाजार में आने में लगभग 3–5 महीने का समय लग सकता है।
जब तक इस विषय पर स्पष्ट नीति निर्णय नहीं आता, तब तक फीड निर्माता बढ़ती लागत को संभालने के लिए राशन रीफॉर्म्युलेशन और वैकल्पिक प्रोटीन स्रोतों के उपयोग पर निर्भर रहेंगे। लेकिन यदि सोयाडॉक उपलब्धता में जल्द सुधार नहीं हुआ, तो आने वाले महीनों में पोल्ट्री, डेयरी और पशु आहार उद्योग पर दबाव बने रहने की संभावना है।








